sc st act in hindi:-
प्रस्तावना
भारत एक विविधताओं वाला देश है जहाँ अलग–अलग जाति, धर्म, भाषा और परंपराएँ पाई जाती हैं। लेकिन लंबे समय तक समाज में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लोगों को भेदभाव, शोषण और अत्याचार का सामना करना पड़ा। इन्हें समान अवसर और सम्मान दिलाने के लिए भारत सरकार ने कई क़ानून बनाए। इन्हीं में से सबसे महत्वपूर्ण क़ानून है – अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, जिसे आमतौर पर SC ST Act कहा जाता है।
SC ST Act क्या है?
SC ST Act एक विशेष क़ानून है जिसे 1989 में संसद ने पारित किया। इसका उद्देश्य SC और ST समुदाय के लोगों को समाज में हो रहे अत्याचार, अपमान, हिंसा और शोषण से बचाना है।
यह अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि –कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों को उनकी जाति या जनजाति के आधार पर अपमानित न करे। उनके साथ मारपीट, दुर्व्यवहार या आर्थिक शोषण न हो।उन्हें न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालतें और तेज़ सुनवाई की व्यवस्था हो।

इस अधिनियम की आवश्यकता क्यों पड़ी?
भारतीय संविधान पहले से ही अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) जैसे प्रावधान देता है। फिर भी ज़मीनी स्तर पर SC और ST वर्ग के लोगों को अक्सर भेदभाव और अत्याचार का सामना करना पड़ता रहा।
उदाहरण:
गाँवों में सार्वजनिक कुएँ या तालाब इस्तेमाल करने से रोका जाना।
मंदिर में प्रवेश न देना।
जातिगत गाली–गलौज।
ज़मीन हड़पना या मजदूरी का शोषण।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए 1989 में यह अधिनियम बनाया गया, ताकि पीड़ित वर्ग को कानूनी सुरक्षा और सम्मान मिल सके।
SC ST Act की मुख्य विशेषताएँ
1. जातिगत अपमान पर रोक – किसी SC/ST व्यक्ति को उसकी जाति बताकर गाली देना अपराध है।
2. संपत्ति पर कब्ज़ा रोकना – SC/ST वर्ग की ज़मीन या संपत्ति हड़पने की कोशिश करना इस अधिनियम के तहत दंडनीय है।
3. शारीरिक हिंसा पर रोक – मारपीट, चोट पहुँचाना, बलात्कार या अन्य शारीरिक हिंसा पर सख़्त सज़ा का प्रावधान है।
4. सामाजिक बहिष्कार रोकना – किसी को जाति के आधार पर सामाजिक रूप से बहिष्कृत करना अपराध है।
5. विशेष अदालतें – मामले की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसी व्यवस्था होती है।
6. कठोर दंड – सामान्य अपराध की तुलना में अधिक सख़्त सज़ा और जुर्माना तय किया गया है।
अधिनियम में दंड का प्रावधान
इस कानून के तहत अपराध साबित होने पर 6 महीने से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा और जुर्माना लगाया जा सकता है।

SC ST Act के तहत अपराधों के उदाहरण
किसी को जातिसूचक गाली देना।
सार्वजनिक जगह पर SC/ST व्यक्ति को अपमानित करना।
SC/ST महिला के साथ यौन शोषण।
उनकी ज़मीन या मकान पर कब्ज़ा करना।
मजदूरी का पैसा न देना।
डराना–धमकाना या फर्जी केस फँसाना।
न्याय व्यवस्था और कार्यवाही
पीड़ित व्यक्ति सीधे पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा सकता है।
पुलिस अधिकारी को तुरंत FIR दर्ज करनी होती है।
जाँच के बाद चार्जशीट विशेष अदालत में दायर की जाती है।
केस की सुनवाई तेज़ गति से होती है।
आलोचनाएँ और विवाद
हालांकि SC ST Act ने समाज में बहुत बदलाव किया है, लेकिन इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आते हैं। कभी–कभी व्यक्तिगत दुश्मनी या ज़मीन विवाद में झूठे केस दर्ज कर दिए जाते हैं।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट और संसद समय–समय पर इसमें संशोधन करते रहते हैं ताकि संतुलन बना रहे।
SC ST Act में संशोधन और सुधार
2015 संशोधन
नए अपराध जोड़े गए जैसे –
SC/ST महिलाओं के साथ यौन शोषण
सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott)
ज़मीन–मकान हड़पना
SC/ST वर्ग को मजबूर करके भीख मँगवाना
पीड़ितों के लिए सरकारी मुआवज़ा और पुनर्वास की व्यवस्था और मज़बूत हुई।
2016 संशोधन
हर ज़िले में विशेष न्यायालय (Special Court) और विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) नियुक्त करने का प्रावधान।
मुक़दमे की तेज़ सुनवाई (Fast Track) सुनिश्चित करने पर ज़ोर।
2018 संशोधन
(बहुत महत्वपूर्ण) Supreme Court ने 20 मार्च 2018 को Subhash Kashinath Mahajan v. State of Maharashtra केस में कहा था कि –FIR दर्ज करने से पहले प्राथमिक जाँच हो।
तुरंत गिरफ्तारी न हो, पहले अनुमोदन लिया जाए।
इसे लेकर देशभर में विरोध हुआ क्योंकि इससे कानून कमजोर हो रहा था।
सरकार ने तुरंत 2018 संशोधन अधिनियम लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।अब पुलिस बिना किसी पूर्व अनुमति के FIR दर्ज कर सकती है।
गिरफ्तारी भी सीधे हो सकती है।
- 2019 संशोधन
पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा और पुनर्वास पर ज़्यादा ध्यान दिया गया।
मुआवज़े की राशि बढ़ाई गई।
केस की निगरानी के लिए Vigilance and Monitoring Committee को और मज़बूत किया गया।
SC ST Act पर प्रमुख केस लॉ
State of M.P. v. Ram Krishna Balothia (1995)
Supreme Court ने कहा कि SC ST Act संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन नहीं करता।
यह कानून विशेष रूप से कमजोर वर्ग की रक्षा के लिए ज़रूरी है।
Subhash Kashinath Mahajan v. State of Maharashtra (2018)
कोर्ट ने कहा कि इस अधिनियम का दुरुपयोग हो रहा है।
इसलिए आदेश दिया कि –
FIR दर्ज करने से पहले जाँच हो।
तुरंत गिरफ्तारी न हो।
लेकिन इस फैसले का ज़बरदस्त विरोध हुआ और बाद में संसद ने 2018 संशोधन पास करके इस आदेश को पलट दिया।
Union of India v. State of Maharashtra (2018 – Review Petition)
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही पहले वाली गाइडलाइन (Subhash Kashinath Mahajan केस) को बदलते हुए माना कि कानून को कमजोर नहीं किया जा सकता।
Prathvi Raj Chauhan v. Union of India (2020)
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के संशोधन को वैध (Constitutional) माना।
यानी अब पुलिस FIR दर्ज करने और गिरफ्तारी करने के लिए किसी पूर्व अनुमति की ज़रूरत नहीं।
हाँ, कोर्ट ने यह भी कहा कि झूठे केस के खिलाफ आरोपी को क़ानूनी संरक्षण (legal remedies) उपलब्ध हैं।

निष्कर्ष
SC ST Act का उद्देश्य समाज में समानता, न्याय और सम्मान को बनाए रखना है।
यह अधिनियम न केवल अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है,
बल्कि पूरे समाज को यह संदेश देता है कि भेदभाव अस्वीकार्य है
और हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।
