प्रस्तावना
भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) हमारे देश का प्रमुख आपराधिक कानून है। इसमें हत्या (Murder), चोरी, धोखाधड़ी, मारपीट से लेकर साइबर अपराध तक के प्रावधान दिए गए हैं। इन सभी अपराधों में Attempt to Murder (IPC 307) सबसे गंभीर अपराधों में गिना जाता है।
कानून की दृष्टि से हत्या और हत्या का प्रयास दोनों ही गंभीर हैं। फर्क केवल इतना है कि हत्या (Section 302 IPC) में किसी व्यक्ति की मौत हो चुकी होती है, जबकि Attempt to Murder में मृत्यु नहीं होती, लेकिन अपराधी का इरादा (intention) और कार्य (act) इतना गंभीर होता है कि यदि पीड़ित समय पर बचाया न गया होता, तो उसकी मृत्यु निश्चित थी।
इसी कारण भारतीय दंड संहिता ने हत्या के प्रयास को भी सख्त दंडनीय अपराध माना है।
Attempt to Murder की परिभाषा (IPC 307)
Section 307 IPC कहता है:
“यदि कोई व्यक्ति इस इरादे से कोई कार्य करता है कि वह किसी दूसरे व्यक्ति की हत्या कर देगा, और वह कार्य ऐसा है जिससे मृत्यु हो सकती है, तो उसे Attempt to Murder कहा जाएगा।”
इसकी मुख्य बातें:
1. अपराधी का इरादा (Intention to Kill) होना चाहिए।
2. ऐसा कार्य (Act) होना चाहिए जो मृत्यु का कारण बन सकता है।
3. वास्तविक मृत्यु होना आवश्यक नहीं है।
Ingredients (Prosecution को क्या साबित करना पड़ता है)
आरोपी का इरादा हत्या करने का था।
आरोपी ने कोई ऐसा कार्य किया जो मृत्यु का कारण बन सकता है (जैसे गोली चलाना, चाकू मारना, जहर देना)।
आरोपी का act इतना गंभीर था कि वह हत्या करने के पर्याप्त करीब था।
Punishment under Section 307 IPC
भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के अनुसार:
1. सामान्य Attempt to Murder →अधिकतम सज़ा: 10 साल की कैद और जुर्माना।
2. अगर चोट लगी है (act से पीड़ित को गंभीर चोट हुई) →अधिकतम सज़ा: आजीवन कारावास (Life Imprisonment) और जुर्माना।
3. Attempt to Murder by Life Convict (अगर अपराधी पहले से आजीवन कारावास भुगत रहा है और उसने Attempt to Murder किया) →सज़ा: मौत की सज़ा या आजीवन कारावास।
👉 इसका मतलब है कि अदालत इरादे (intention) और परिस्थितियों (circumstances) को देखकर सज़ा तय करती है।
Important Case Laws
1. State of Maharashtra v. Kashirao (2003)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल चोट लगने से Attempt to Murder साबित नहीं होता।सबसे महत्वपूर्ण है इरादा (intention) और अपराध का स्वरूप (nature of act)।
2. Sarju Prasad v. State of Bihar (1965)
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 307 IPC में दोषसिद्धि के लिए यह देखना ज़रूरी है कि क्या आरोपी की मंशा वास्तव में हत्या करने की थी।
3. Om Prakash v. State of Punjab (1961)
कहा गया कि यदि आरोपी ने हथियार का प्रयोग किया है और हमला ऐसा था कि मौत हो सकती थी, तो उसे 307 IPC में दोषी ठहराया जा सकता है।
4. State of M.P. v. Saleem (2005)
इसमें कोर्ट ने कहा कि गंभीर हथियार से बार-बार वार करना ही आरोपी की मंशा को दर्शाता है।
Common Defences in Attempt to Murder Cases
आरोपी के पास कई कानूनी बचाव (defences) हो सकते हैं:
1. Intention का अभाव (Lack of Intention)
अगर आरोपी का इरादा हत्या करने का नहीं था, तो 307 IPC लागू नहीं होगा।
2. Act का स्वरूप (Nature of Act)
अगर कार्य ऐसा नहीं था जिससे मृत्यु हो सकती थी (जैसे हल्की चोट), तो मामला मारपीट (IPC 323/324) में बदला जा सकता है।
3. Self Defence (निजी प्रतिरक्षा का अधिकार)
अगर आरोपी ने अपनी जान बचाने के लिए कार्य किया हो, तो वह Right of Private Defence (IPC 96-106) का हवाला दे सकता है।
4. Medical Evidence
अगर मेडिकल रिपोर्ट में यह न लिखा हो कि चोट जानलेवा (life-threatening) थी, तो अदालत 307 IPC की बजाय हल्की धाराएँ लगा सकती है।
5. Absence of Motive
अगर हत्या का कोई ठोस कारण या पूर्व-द्वेष (enmity) नहीं है, तो अदालत आरोपी के पक्ष में नरमी बरत सकती है।
उदाहरण (Illustration)
Case-1: आरोपी ने पीड़ित पर देसी कट्टा से गोली चलाई, गोली पेट में लगी, लेकिन समय पर इलाज होने से पीड़ित बच गया।
धारा 307 IPC लागू होगी।
Case-2: आरोपी ने गुस्से में लाठी से वार किया, हल्की चोट लगी और कोई जानलेवा स्थिति नहीं बनी।
धारा 323/324 IPC लागू होगी, न कि 307।
अगर किसी पर FIR हो जाती है तो आगे क्या करें?
1. FIR की कॉपी जरूर लें
FIR दर्ज होते ही सबसे पहले इसकी कॉपी प्राप्त करें।
FIR की कॉपी के बिना कोर्ट में सही तरीके से केस फॉलो करना मुश्किल होता है।
2. कानूनी सलाह तुरंत लेंकिसी भी मामले में, खासकर IPC 307 जैसे गंभीर अपराध में, अच्छे Criminal Lawyer से तुरंत संपर्क करें।वकील आपको बताएगा कि जमानत (Bail) कब और कैसे अप्लाई करनी है।
3. Bail पर फोकस करें
IPC 307 Non-Bailable Offence है।
जमानत के लिए वकील Regular Bail या Anticipatory Bail के लिए कोर्ट में अप्लाई कर सकता है।
इस दौरान पुलिस आपको गिरफ्तार कर सकती है, इसलिए legal representation जरूरी है।
4. सबूत और गवाहों का ध्यान रखें
अगर आप आरोपी हैं, तो अपने पक्ष के सबूत और गवाह तैयार रखें।
FIR में लिखी बातें और आरोप का विरोध करने के लिए strong documentation जरूरी है।
5. कोर्ट की प्रक्रिया फॉलो करे
FIR के बाद पुलिस Investigation करेगी और फिर Charge Sheet दाखिल करेगी।
कोर्ट की नोटिस मिलने पर समय पर उपस्थित हों।
6. धैर्य रखें और बयान सावधानी से दें
पुलिस या कोर्ट में किसी भी सवाल का जवाब देने से पहले वकील की सलाह लें।
बिना सलाह दिए कोई लिखित या मौखिक बयान न दें।



