lok adalat : प्रस्तावना
भारत की न्याय व्यवस्था विशाल और जटिल है। हर वर्ष लाखों नए मुकदमे अदालतों में दर्ज होते हैं और पुराने मामलों के साथ मिलकर अदालतों पर अत्यधिक बोझ डालते हैं। नतीजा यह होता है कि एक आम नागरिक को न्याय पाने के लिए वर्षों इंतज़ार करना पड़ता है।
समय, पैसा और मानसिक पीड़ा – यह सब मिलकर न्याय की राह को कठिन बना देते हैं।
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए एक वैकल्पिक न्याय प्रणाली की आवश्यकता महसूस हुई और इसी के तहत लोक अदालत की स्थापना की गई।
लोक अदालत का मकसद है आम जनता को तेज़, सस्ता और सुलभ न्याय उपलब्ध कराना। यह अदालत न केवल विवादों का निपटारा करती है बल्कि पक्षकारों के बीच आपसी समझौता और सहयोग को भी बढ़ावा देती है।

लोक अदालत की परिभाषा
लोक अदालत का शाब्दिक अर्थ है – “जनता की अदालत”।
यह एक ऐसी वैकल्पिक न्याय प्रणाली है जहाँ विवादों का समाधान आपसी समझौते से किया जाता है। इसमें न्यायाधीश, वकील और समाज के प्रतिष्ठित लोग मिलकर दोनों पक्षों की बात सुनते हैं और समाधान का रास्ता निकालते हैं।
लोक अदालत का निर्णय सिविल कोर्ट की डिक्री जैसा होता है और उस पर अपील नहीं की जा सकती। यानी इसका फैसला अंतिम और बाध्यकारी होता है।
लोक अदालत का इतिहास और उत्पत्ति
भारत में लोक अदालत का विचार नया नहीं है। प्राचीन समय में गाँवों में पंचायती न्याय प्रणाली प्रचलित थी, जहाँ विवादों का निपटारा बुज़ुर्ग और पंच करते थे।
आधुनिक काल में पहली बार 1982 में गुजरात में लोक अदालत का आयोजन किया गया। इस प्रयोग को सफलता मिली और धीरे-धीरे पूरे देश में इसे अपनाया गया।
इसके बाद विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987) के तहत लोक अदालतों को संवैधानिक मान्यता दी गई। इस अधिनियम के लागू होने के बाद लोक अदालतें पूरे भारत में संगठित और नियमित रूप से कार्य करने लगीं।
लोक अदालत के उद्देश्य
लोक अदालत की स्थापना के कई महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं:
1. न्याय तक सबकी पहुँच सुनिश्चित करना – गरीब और कमजोर वर्ग भी आसानी से न्याय पा सकें।
2. तेज़ न्याय – मामलों का निपटारा जल्दी हो ताकि लोगों को वर्षों अदालतों में चक्कर न काटने पड़ें।
3. कम खर्चीला न्याय – यहाँ कोई कोर्ट फीस नहीं लगती।
4. आपसी समझौते को बढ़ावा – विवाद का हल आपसी सहमति से निकालना।
5. अदालतों का बोझ कम करना – लंबित मामलों की संख्या घटाना।
लोक अदालत की विशेषताएँ
इसमें न्यायिक अधिकारी, अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं। फैसले आपसी सहमति से लिए जाते हैं, किसी पर थोपे नहीं जाते। यहाँ मुकदमों की सुनवाई सामान्य अदालत की तरह जटिल नहीं होती।फैसला अंतिम होता है और उस पर अपील नहीं की जा सकती।
लोक अदालत के प्रकार
भारत में लोक अदालतों को मुख्यतः तीन प्रकारों में बाँटा गया है:
1. स्थायी लोक अदालत (Permanent Lok Adalat)
यहें सार्वजनिक उपयोग की सेवाओं से जुड़े विवादों को सुनने का अधिकार है,
जैसे –परिवहन
बिजली-पानी
डाक सेवा
दूरसंचार
इन मामलों में लोक अदालत पहले दोनों पक्षों को समझौते का अवसर देती है। अगर समझौता नहीं होता तो अदालत खुद फैसला सुनाती है।
2. राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat)
यह पूरे देश में एक साथ आयोजित होती है।
आमतौर पर हर महीने के दूसरे शनिवार को यह लगती है और इसमें एक ही दिन में लाखों मामलों का निपटारा किया जाता है।
3. मोबाइल लोक अदालत (Mobile Lok Adalat)
यह गाँव-गाँव जाकर लोगों के विवाद हल करती है। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में जहाँ लोग सामान्य अदालतों तक आसानी से नहीं पहुँच पाते।
लोक अदालत में सुने जाने वाले मामले
लोक अदालत केवल उन्हीं मामलों को सुनती है जिनका समाधान आपसी समझौते से संभव हो। इनमें शामिल हैं:
पारिवारिक विवाद (जैसे पति-पत्नी का झगड़ा, गुज़ारा भत्ता आदि)
पैतृक संपत्ति विवाद
बैंक और ऋण से जुड़े मामले
बिजली-पानी बिल संबंधी विवाद
मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति दावे
श्रम विवाद
फौजदारी (Criminal) के वे मामले जो समझौते योग्य (Compoundable Offences) हों

लोक अदालत की कार्यप्रणाली
1. मामला दर्ज होना – कोई भी पक्ष या अदालत स्वयं किसी मामले को लोक अदालत में भेज सकती है।
2. दोनों पक्षों को बुलाना – दोनों पक्षों को नोटिस देकर बुलाया जाता है।
3. समझौते का प्रयास – सबसे पहले समझौते का प्रयास किया जाता है।
4. निर्णय सुनाना – अगर समझौता हो जाए तो उसे लिखित रूप दिया जाता है। यदि समझौता न हो पाए तो स्थायी लोक अदालत खुद निर्णय सुनाती है।
लोक अदालत के लाभ
1. तेज़ और सस्ता न्याय – सामान्य अदालतों की तुलना में बहुत जल्दी और बिना खर्चे के न्याय।
2. औपचारिकता कम – लंबी कानूनी प्रक्रिया और तकनीकी पेचिदगियों से बचाव।
3. जनसहभागिता – समाज के प्रतिनिधि भी न्याय प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं।
4. अदालतों का बोझ कम – लाखों मामलों का निपटारा एक ही दिन में।
5. दोनों पक्षों का संतोष – समझौते से समाधान होने के कारण दोनों पक्ष आम तौर पर संतुष्ट रहते हैं।
लोक अदालत की सीमाएँ
हर विवाद लोक अदालत में हल नहीं हो सकता।
गंभीर आपराधिक मामले (जैसे हत्या, बलात्कार) यहाँ नहीं सुने जाते।
फैसले पर अपील का अधिकार नहीं होता, इसलिए अगर किसी पक्ष को न्याय न मिले तो समस्या हो सकती है।
कभी-कभी दबाव में समझौता हो जाता है।
आज के दौर में लोक अदालत की भूमिका
आज भारत में न्यायालयों पर करोड़ों मामले लंबित हैं। ऐसे में लोक अदालतें लोगों के लिए राहत का बड़ा साधन बनी हैं। विशेष रूप से बैंकिंग विवाद और मोटर दुर्घटना दावे लोक अदालतों के माध्यम से तेजी से निपटाए जा रहे हैं। सरकार और न्यायपालिका दोनों लोक अदालतों को प्रोत्साहित कर रहे हैं ताकि “न्याय सबके लिए” और सपना साकार हो सके।

निष्कर्ष
लोक अदालत भारत की न्याय प्रणाली का एक सशक्त स्तंभ है। यह आम जनता को न्याय पाने का एक आसान, सस्ता और त्वरित विकल्प देती है। हालाँकि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, लेकिन फिर भी यह अदालतों के बोझ को कम करने और न्याय को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। लोक अदालत वास्तव में न्याय को गाँव-गाँव और गली-गली तक पहुँचाने का प्रयास है।



